1971 India Pakistan war Story

भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय पाकिस्तान दो भागों में बटा हुआ था। पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान। बांग्लादेश उस समय पूर्व पाकिस्तान था। पश्चिमी पाकिस्तान के लोग पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को पसंद नहीं करते थे। उनका मजाक उड़ाते थे। 1970 में पश्चिमी पाकिस्तान के शेख मुजीब उर रहमान चुनाव जीत गए। यह प्रधानमंत्री बन गए। पश्चिमी पाकिस्तान की आर्मी ने उन्हें शपथ नहीं लेने दिया। तब शेख मुजीब उर रहमान ने 7 मार्च 1971 को एक भाषण दिया और उन्होंने कहा कि पूर्वी पाकिस्तान को हम एक अलग देश बनाएंगे। जिसका नाम रहेगा बांग्लादेश। इस भाषण को सुनने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान की आर्मी ने इन्हें बंदी बनाकर 25 मार्च 1971 को जेल में डाल दिया और पूर्वी पाकिस्तान में जुल्म करना चालू कर दिया। शेख मुजीब उर रहमान की गिरफ्तारी को सुनकर पूर्वी पाकिस्तान में एक मुक्त वाहिनी गुट तैयार हो गया। लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर इतना भयानक जुल्म किया, 30 लाख लोगों को कटवा दिया। 400000 महिलाओं का बलात्कार कर दिया।

इस भयानक जुल्म का नतीजा यह हुआ कि अप्रैल 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान के लोग भागकर भारत आ गए। भारत में 1000000 लोग आ गए। इंदिरा गांधी जानती थी, कि जब तक पूर्वी पाकिस्तान में शांति नहीं होगी तब तक यह लोग अपने देश वापस नहीं जाएंगे। इंदिरा गांधी ने सेना प्रमुख मानेकसाव से बात की, और युद्ध करने का आदेश दिया।मानेकसाव ने युद्ध करने से मना कर दिया क्योंकि अप्रैल के महीने में बरसात होती है, और भयानक बाढ़ आती है इसलिए। सेना प्रमुख ने कहा कि हम नवंबर तक युद्ध नहीं करेंगे लेकिन इस बीच में मुक्ति वाहिनी और अपनी सेना को उस जगह पर लड़ाई करने के लिए ट्रेनिंग देंगे। इसी बीच 1978 में भारत और रूस के बीच समझौता पर हस्ताक्षर हो गया। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने श्रीनगर, पठानकोट, चंडीगढ़, आगरा,पर हमला कर दिया। भारत इसी मौके का इंतजार कर रहा था। इसी बीच पाकिस्तान को खबर मिली कि भारत की अधिकतर फौज पूर्वी पाकिस्तान की रक्षा कर रही है। भारत के राजस्थान राज्य में लौगेवाला जिला में केवल 120 फौजी हैं, पाकिस्तान ने सोचा कि इन फौजियों को रात में हम एक साथ मार देते हैं। पाकिस्तान के हजारों की संख्या में सैनिक, टैंक, औजार राजस्थान में घुस गए। राजस्थान में फौजियों के मेजर कुलदीप सिंह को खबर मिली कि लड़ाई करने के लिए पाकिस्तान के ब्रिगेडियर तारीक मीर आ रहा हैं। ब्रिगेडियर तारीक मिर के पास 2800 टैंक है बहुत ही तेजी से आ रहे हैं। कुलदीप सिंह के पास बहुत ही कम औजार थे। इनके पास 3 माइंस थे। इन्होंने तब दिमाग लगाया और आगे ओरिजिनल 3 माइंस को लगा दिया और खाना खाने वाले टिफिन को रातों-रात पूरे एरिया में बिछा दिया। जो कि देखने में माइंस की तरह लगते थे। पाकिस्तान जैसे ही तेजी से आया उसके तीनों टैंक का एक-एक करके उड़ गए। पाकिस्तान डर गया। तब पाकिस्तान के ब्रिगेडियर तारीक मीर ने इंजीनियरों को बुलाया माइंस निकलवाने के लिए। पाकिस्तानियों ने 6 घंटे लगा दिए माइंस निकालने में। तब पाकिस्तान को पता चला कि यह माइंस नहीं टिफिन है। वे लोग फौजियों पर हमला कर दीये। तब कुलदीप सिंह ने 2 किलोमीटर एरिया में अपने फौजियों को बिछा दिया था। चारों तरफ से फायरिंग होने की वजह से पाकिस्तानी कंफ्यूज हो गए। उन्हें लगा कि गलत इंफॉर्मेशन मिली है। जब सुबह हुई तो भारत के हंटर जहाजे, पाकिस्तानियों पर आक्रमण करने लगी। और पाकिस्तानियों की धज्जियां उड़ा दी गई। पाकिस्तान की हार हो गई और उसका मनोबल टूट गया।

नेवी 5 दिसंबर 1971 को कराची पहुंची। वहां पहुंचकर नेभी ने बहुत भयानक बमबारी किया और कराची को तबाह कर दिया। बहुत दिनों तक कराची बंदरगाह पर आग लगी हुई थी। तब पाकिस्तानियों की कमर टूट गई और वह शरण लेने के लिए ग्वादर चले गए। पाकिस्तान ने भारत को तबाह करने के लिए भारत का सबसे खतरनाक जहाज आई एन एस विक्रांत को तबाह करने के लिए पश्चिमी पाकिस्तान से पीएनआई गाजी को भेज दिया। पीएनआई गाजि पनडु्बी थी, जिसे आदेश दिया गया विक्रांत को मारने के लिए। लेकिन गाजी पनडुब्बी को एक को छोटी जहाज ने हीं डूबा दिया।

पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति वाहिनी सेना अंदर ही अंदर पश्चिमी पाकिस्तान के सैनिकों को मार रही थी। इनका साथ दे रही थी ऊपर से एयर फोर्स और बाहर से इंडियन आर्मी। पूर्वी पाकिस्तान में चटगांव पश्चिमी पाकिस्तानी आर्मी का एरिया था। आई एन एस विक्रांत ने उसे रिया को बर्बाद कर दिया। पाकिस्तान किसी भी हालत में विक्रांत को बर्बाद करना चाहता था। पाकिस्तान की पनडुब्बी गाजी को साइलेंट किलर कहा जाता था। यह पानी के अंदर जाती थी किसी को भी नहीं होता था। यह पश्चिमी पाकिस्तान के अरब सागर से बंगाल की खाड़ी की ओर चल दिए। खुफिया जासूसों के माध्यम से भारत की आर्मी को पता चल गया और विक्रांत को बचाना बहुत ही जरूरी था इसलिए विक्रांत को सेफ्टी दिया गया। पी एन एस गाजी को आई एन एस राजपूत मारकर डूबा सकता था लेकिन इसके इंजन में कुछ खराबी आ गई थी। इसे विशाखापट्टनम के बंदरगाह पर रिपेयर किया जा रहा था। तभी भारतीय आर्मी ने दिमाग लगाया की पीएनएस गाज़ी को विशाखापट्टनम बंदरगाह पर बुलाकर लाया जाए। भारतीय आर्मी को पता था कि हिंदुस्तान में पाकिस्तान के कुछ न कुछ जासूस होंगे, और वह पाकिस्तान को पल-पल की खबर दे रहे होंगे।भारतीय आर्मी ने आई एन एस विक्रांत के कर्मचारियों को बोला कि आप अपने घर पर फोन लगाइए कि हम विशाखापट्टनम के बंदरगाह पर आ रहे हैं। विशाखापट्टनम के बंदरगाह पर रहनेवाले मछुआरों को कहा गया कि आप लोग हट जाइए यहां बहुत बड़ा जहाज विक्रांत आ रहा है। यह खबर पाकिस्तान में आग की तरह फैल गई। तब पी एन एस गाजी विशाखापट्टनम की ओर चल दिया। जैसे हैं पीएनएस गाज़ी पानी के नीचे नीचे आई एन एस राजपूत पर हमला करने जा रही थी, उससे पहले ही आईएनएस राजपूत ने पिएन एस गाजी को तबाह कर दिया। पी एन एस गाजी के डूबने के बाद पाकिस्तान को बहुत बड़ा सदमा लगा। पाकिस्तान को एहसास हो गया कि अब हम कभी नहीं जीत सकते हैं। पाकिस्तान ने अमेरिका में अपनी बात कही। अमेरिका ने यूएनओ में मुद्दा उठाया। रसिया ने भारत का साथ देते हुए इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। जहां पर पाकिस्तान की एक और उम्मीद में दम तोड़ दिया। पाकिस्तान ने अमेरिका से मदद मांगी। अमेरिका ने पाकिस्तान पर हमला करने के लिए अपना सबसे खतरनाक जहाज सातवां बेड़ा भेज दिया। यह जहाज पूरी फौज के साथ चलता था। यह जहाज विक्रांत को डुबाने के लिए आया था। तब भारत ने रूस से मदद मांगी। भारत की मदद करने के लिए रूस ने अपना 40 वा बेड़ा और परमाणु पनडुब्बी भेज दिया। रूस ने अमेरिका से कहा कि अगर आपने विक्रांत पर हमला किया तो यह हमला हम रूस पर समझेंगे। रूस ने अपने यमन आर्मी से कह दिया था भारत की सुरक्षा करने के लिए। भारत के खिलाफ अमेरिका का सातवां बेड़ा और इंग्लैंड का ईगल जहाज आक्रमण करने के लिए आया। उस समय रूस ने भारत के साथ सच्ची दोस्ती निभाई थी।

भारत सरकार ने पाकिस्तान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए निर्मलजीत सिंह अरोड़ा ने एक प्लान बनाया। उन्होंने हवाई जहाज से सैनिकों को बांग्लादेश के ढाका पर एयर लैंडिंग कराई। उन सैनिकों में से सैनिक बहुत कम थे अधिकतर पुतलों को नीचे उतारा गया था। मीडिया ने इस खबर को आग तरफ फैला दिया। यह सुनकर पाकिस्तानियों का मनोबल पूरी तरह से टूट गया। एयर फोर्स ने बांग्लादेश के गवर्नर के घर के ऊपर हमला कर दिया। वहां के गवर्नर हाउस ने डर की वजह से त्यागपत्र दे दिया।

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लेफ्टिनेंट जनरल निर्मलजीत सिंह ने पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी से बातचीत की। उन्होंने सरेंडर करने की बात कही। भारत जल्दी से जल्दी इस युद्ध को खत्म करना चाहता था। क्योंकि यह एक अंतरराष्ट्रीय मैटर हो चुका था। 16 दिसंबर 1971 को लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने आत्मसमर्पण कर दिया। लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने हमारे भारत के लेफ्टिनेंट जनरल निर्मलजीत सिंह के सामने आत्मसमर्पण पत्र पर साइन किया। पाकिस्तान के 93000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद बांग्लादेश स्वतंत्र हो गया। इंदिरा गांधी का कहना था कि ढाका स्वतंत्र राजधानी है स्वतंत्र बांग्लादेश की। शेख मुजीब उर रहमान को स्वतंत्र कर दिया गया। आज के समय में शेख मुजीब उर रहमान की बेटी, शेख हसीना बांग्लादेश की कमान संभाल रही है।

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